किसी यायावर के हृदय परिधि के भीतर जो वात्सल्य का भाव अपने यायावरी के शौक़ के लिए होता है वही मेरे भीतर भी पनपने लगा था पर दुर्भाग्य यह नहीं था कि समाज मेरे भाव को बेतुका और निराधार समझता था , एक छोटा कारण जो कि यह भी था , बल्कि समाज से पहले मैं ही असमर्थ थी अपने चित्त में उठते अठखेलियाँ को ठोस एवं योग्य मानने में । वास्तव में इस कहानी का यह आरंभ तो क्या अंत भी नहीं ! मैंने सोचा कि क्या मूर्खता कि पराकाष्ठा इसे ही कहते हैं या मैं किसी बौराए हुए , मस्त- मौला आर्टिस्ट जैसे फंतासी की दुनिया में गुमशुदगी को अपना दैव मान चुकी हूँ । जो भी था , जैसा भी था पर मैंने विश्व भर का बल लगा कर उस एक प्यास से तृप्ति पाने का अंतिम प्रयास करना चाहा । मूर्खता तो स्वीकार्य करना एक कलमकार की सबसे बड़ी सिद्धि है । पर जाने अनजाने में मैंने एक रेगिस्तान में अपना निलय बनाने की ज़िद कर ली जहाँ पानी की एक बूँद नहीं थी बस था तो मृगतृष्णा से जन्मा हुआ पागलपन और उस पागलपन में स्वयं को बिखेरती हुई मैं – सितारा ।
मैं जो करती थी वह लोगों को भाता नहीं था और इस हद तक कि कोर्ट ने नोटिस कि बौछार इस कदर की जैसे कोई युवक लुटाता है पैसे स्याही पर – पन्ने पर, एंटीक , गणित के प्रश्न हल करने के मकसद से नहीं, प्रेम पत्र लिख कर 21वीं सदी में भी ओल्ड स्कूल रोमांस करने की ख़ातिर । मैं कौतुहल से अपनी रंगों में सराबोर कैनवास को देखती रही, कुछ अर्धनिर्मित, कुछ पूर्ण होकर भी अपूर्ण, कुछ शोहरत में भींग, अकेले दीवार पर टंगे हुए, कुछ बेमिसाल और कुछ मेरे मन से उतरे हुए- स्टूडियो के कोने में पड़े हुए । निश्चित ही इनमें होगा कुछ अप्राकृतिक या कुछ भद्दा जो घृणा का पात्र इन्हें बनाता है । पर खाली जेबों से सिक्के खंगाल कर और अपनी बनाई हुई पेंटिंग में मनहूस या अश्लील जैसी कुछ भी खंगाल कर मैं थकावट वश सो गयी और न सिक्के मिलें, न ही कोई कारण कोर्ट में प्रस्तुति का । नींद खुली तो जो अंतरंगी सपने थे वह सब ध्वस्त हो गए और सपनों से पहले सोच को राह देते हुए मैंने कोर्ट के उस नोटिस को चार टुकड़ों में फाड़ दिया । चार टुकड़े चार दिनों की नींद को बेतहाशा बर्बाद करने की खुशी में ।
मैं हूँ राग सितारा । जितना मतवाला मेरा नाम है उतना ही मेरा 24 वर्षीय जीवन । हैरान करने वाली बात यह नहीं है कि मैंने 24 वर्षों में ऐसा क्या कर दिया कि अदालत का बुलावा आरहा है और मेरे हिम्मत के क्या कहने जो मैं समन को किसी अनचाहे स्केच की भांति फार कर फेंक रहीं हूँ । मैं आज़ाद भारत में एक आर्टिस्ट हूँ पर आज़ाद होकर भी मेरे ब्रूस को जब कोरे पन्ने से लिपटने की स्वतंत्रता नहीं तो त्रासदी और किसे कहेंगे ? मैं रंगों से बनाती हूँ मानव का वो रूप जो नैसर्गिक नहीं इसलिए समाज को सहन नहीं । वस्त्रों के बंधन को नहीं स्वीकारते मेरे मनगढ़ंत किरदार और इसलिए समाज को सहन नहीं । मैं पेंट करती हूँ नग्न कैनवास पर नग्न देह और क्या हो सकता है अधिक मानवीय मानव के खुद की काया से बढ़कर ? यही समाज देह का दाम लगाता है रातों के भाव और मैंने बेदाम बनाया औरत का देह इसलिए समाज को सहन नहीं ।
